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Sati 1


|< पवित्र सती प्रथा >| हमारे महान भारतीय हिंदू धरम मे राजा राममोहन रॉय के पहले पती के मरने के बाद उनकी जिंदा जला दिए जानेवाली, या खूद को ख़ुशी से जिंदा जला कर पवित्र सती बनने मे गौरव महसूस करने वाली तथाकथित पतीव्रता पत्नियोंकी जात अब तो सती हो जाने के बजाय ५ वा पति भी धुंडती नजर आती है. अब हमारे प्रिय पंतप्रधान मोदिजी कि छोडी हुई पत्नी जसोदा बेन को छोड कर क्या और कौनसा महिला सबली करन बाकी है? हिंदूओंकी सारी पुरानी प्रथाओंके साथ घिनौनी जाती प्रथाके और जातीओंका भी अगर खुद को गर्वसे हिंदू कह्लाने वाले उदात्तीकरण और समर्थन करनेमे अभिमान और गर्व महसूस करते है, तो हमारी वोह गौरवशाली सती कि प्रथाभी फिरसे पुनर्स्थापित होनी क्या और कौनसा गैर है? उलटा होली, रंगपंचमी, कुंभमेला, गोपाल काला, दिवाली, गणेशोत्सव जैसे, हर इन्सान के अंदर छुपी अमानवियता या भडास निकलवानेके हि हेतूसे बम्मनो द्वारा एतद्देसी हिंदूओंके लीए रचित सारे इव्हेण्तो जैसे एक और इव्हेंट हमारे उत्सव प्रिय हिंदू भाईओंको मिल सकता है. उसके लीए तो जहा खुदके बाप कि भी मरन तिथी बम्मन अपने पंचांगसे नही धुंड सकता वहा तो कमसे कम पंचांग मे लिखी तिथी पता करने के लीए किसी भी बम्मनकि जरुरत नही महसूस करेंगे हमारे हिंदू भाई, अगर मरना असमयिक है, याने मरन कि तिथी या समय तय नही होता है. सती की प्रथा पुनर्स्थापित हो जाएगी तो हिंदू भाई लोग सालके ३६५ दिन और रातमे भी किसी भी समय अपनी बहने भौजाई और लडकीयोंके के सती जाने का पवित्र उत्सवका इव्हेण्ट बेंड बाजे के साथ धूमधामसे मनाते और भी खुश रहेंगे, अगर हिन्दुस्थान मे हिंदूओंमे और उनके कीसानोंमेहि बिमारीया और आत्महत्याओंके प्रमाण अधिक है. बम्मनोंकी तो निकल ही पडेगी अगर सती प्रथा पुनर्स्थापित हो जायेगी तो! वोह स्वार्थ के पुजारी एक मौत के उपर एक और मौत फ्री ऐसी सती कि विधिया करनेमे ही सदा व्यस्त हो जाते, थे और आजकल के जैसे किसी नामर्द को भी राजा बनानेकी स्वार्थी और गंदी राजनिती खेलते नजर नही आते थे. दलीत और ओबीसी बहनो, सती प्रथा इस तरह पुनर्स्थापित होने से आपको चिंतीत होने कि कोई आवशकता नही है. दलित और ओबीसी मच्छीमारी और खेती करना, पेड काटना जैसे मेहनत के कामसे तंदुरुस्त रहते है. जनमजात कंगाल होने के कारण रुखी सुखी या झुठी पत्तीया चाटकर भी खुदको जीवित रखते आये है वोह ५००० सालोंसे. तंदुरुस्त रहनेके लीए उन्हे वोह बैठमुरारी व्यावसायीक बम्मन और सेठिया पेटलोंके जैसे, केवल कुछ तो भी शारीरिक कष्ट करते है, ऐसा मानसिक हि सही समाधान पाने के लीए निर्मीत योगा जैसे पाखंड कि कोई जरुरत नही पडती है. सबसे ज्यादा बम्मन और सेंठीयोंको ही अपनी औरतोंको ढके रखने कि जरुरत पडती थी, इस बातसे दुनिया भी जानती होगी कि वोह अलसी लोग शारिरीक कष्ट या मेहनत कैसे टालते थे. दलीतो और ओबीसीओ आपके मेहनती व्यवसायोंकी बदौलत आपको शारीरिक और मानसिक पिडाए सेठीयोंसे और बम्मनोंसे कम सताती है. सारी संपत्ती और जमीने जायदाद उच्चवर्नियोन्के हाथों मे होने से केवल कुपोषण हि आपकी व्याधीओंका कारण होने कि संभवना रहती है. देखते हो ना कैसे महंगे अस्पतालोनमे यह लोग चमडी से लेकर सारे शरीर के अवयावोंकी खरीददारी या याचनादेही करते और गैर तरीकोंसे कमाए पैसे ढीले करते नजर आते है! छोडो वोह ५००० सालोंसे माया बटोरने वालोंकी बात. दलित और ओबीसी बहनो मुद्दा यह है कि तंदुरुस्त होनेसे आपके पती देवोंका मरना बाकीओंके जितना आसान नही रहता है. और मरन आया भी तो क्या? अरे हम तो सती प्रथा मानते हि नही थे तो तुम्हारे जल जानेकी इच्छा दिलमे होते हुए भी तुम्हारी सांसे भी वैसे मांग जाहीर करनेकी हिम्मत क्या कर सकती थी? हमारी औरते तो पती के जिंदा होते हुए भी दुसरा घरोंदा बसानेकी पूर्वापार हकदार है. वोह तो खेतोंमे हल खंदेपर लेकर बाप, पती, या बेटे के साथ खेत भी जो लेती थी. थे ना हम इन अभिजन और अभी नौकरीपेशा बन पा सकी औरोतोंसे ज्यादा प्रगतीशील? बेच्चारी सदा ढकी रखनेसे टाइट हवा भरे गुब्बारा जैसे अचानक फुट जानेसे तितर बितर हो जाता है वैसे माता सावित्रीबाई फुले कि मेहरबानीसे उनके सारे बंधन टूट जाते हि केवल वोहि सबसे जादा स्वैर बनी दिखना स्वाभाविक है. हमारे गर्वसे कहो हिंदू है ऐसे चील्लाने वाले हिंदू अपनी गैर अस्पृश्य उच्च जाती के साथ साथ बम्मनोंके भी अभिमानी लेकीन उनके बताए जा रहे दुश्मन ब्रिटिशोंकी बदौलत हि उच्च शिक्षित भी होने के बावजुद यह मानने कि स्थिती मे भी नही है कि उनके वंदनीय और हिंदू धर्म के चालक ,मालक बम्मनोंनेहि हिंदू यह कोई धर्म नही बल्की नाममात्र जीवन पद्धती याने कल्चर है ऐसा ऐलान करके उनके हिंदू होने के गर्व के सारे टायरोंको कायम स्वरूपी पंक्चर करके उनकी सारी हवा हि निकाल दि है. ऐसे हिंदू भैयो तुम्हारे गर्व कि बात ऐसे इस हिंदू धर्मकी सारी प्रथाओंका तुम्हे अभी भी गर्व है तो सती प्रथा भी पुनर्स्थापित करो ना, अगर दिलसे जाती प्रथा तोडना और पीछडोंके आरक्षण से जलनेसे जादा उसका स्वागत करना नही चाहते हो तो. सती प्रथा का तुम जबर स्वाभिमानीयोंका अहम फायदा यह रहेगा कि खुदके पत्नी के उपरके तुम्हारे अकेलेके स्वामित्वका तुम्हारा एहसास और होगा तो स्वाभिमान भी तुम्हारे मरते दम तक बरकरार रह जायेगा, जब तुम्हे पुरा यकीन रहेगा कि तुम्हारे मरने के बाद तुम्हारी पत्नी छचोर भी रहेगी तो भी वोह तुम्हारे अपने रीश्तेदारोनके जबर्द्स्तीसे सती कि चित्तापे चढानेके और जल जाने के बाद कोई भी छचोर गिरी करनेकी संभवना हि नही रहेगी. चलो मै भी तुम्हारे साथ चिल्लाउंगा सती प्रथा अमर रहे!

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