५००० सालोंसे सारि जमिने ओर सारा का सारा सोना चांदि लुट लेने का बाद कंगाल किये देशमे बचा हि कया हे, कंगाल दलितोंको देने के लिये, ऐसे देश के पास जिस देशको हिनदुसथान कहलानेके आग्रही हिंदु धरम के सर्वेसर्वा बममन जो मुसलमान अरबोंके मछिमारिके धंदेका भि अर्थिक लाभ लाटनेकि लालसासे, जिस मुसलमान धरम का वोह तिरसकार करनेको बुद्दु हिंदूओंको और दुसरोंको उकसाते हे, उस इसलामको भि और इस्लामको ही अपनाकर, केरलाके मुसलमान मोपला बन जाते है. खाक होगा दलितोंका भला ऐसे भोंदू, बम्म नोंके गांडू लोग ओर देशमे? एक भोपु एक पांडे जि कह रहे थे कि मोदि दलितोंका हितेषि हे. जो बडप्पन कि लालसामे खुद की बेचारि बेसहारा औरत को भि ठुकराता है वोह कया १२० करोडोंका हो सकता है ? पांडेजि जीसे उपरि रिपलाइके बाद शायद रुकनेमे अकलमंदि नहि यह जानकर, बममनोंके मुसलमान बने मोपलाओंको ढुंढने जाना बेहतर समझा होगा और मैदानसे भाग गया. बममन हि था वोह भि. उनको कोन रोक सकता हे कुछ भि करनेसे और बोलनेसे ? साले ५००० सालोंसे उनकाही तो अखंड आरक्षण है, बाकी हिंदूओंको आशीर्वाद और धरम के नामसे चुतीया बनाके लुटनेका. ओर एक भोंपु भडवा बेकार पडा एकटर लिखता है कि मोदि के खिलाफ जैसे बडे बडे लोगोंने अपने अॅवर्ड्स वापस किये वेसे मोदि के खिलाफ बोलने वाले दलित उनका अरक्षण वापस कर दे. उस अनपढ और गंवार भोंपु ने अगर उपरकि कुछ लाइनेभि समझ लि तो वोह जो हर जगह फेल साबित होता दिखता है उसकि वजहे कमसे कम खुद जान पानेके काबिल अपने आप बननेकि उमिदे है . दलितोंका आरक्षण ना मोदि कि देन हे और नाहि उसकि अम्माको सांसद बनाने वाले बममनोंकि. आरक्षण संविधानिक हे. बम्मन और बम्मनोंने उनकी खुद कि रखवाली करनेके लिये हि शस्त्र धारणा के लाइसन दे कर क्षत्रीय बनाये थे और उन क्षत्रीयोंके बगलबच्चे गत ५००० सालोंसे जो चरबि जमाके बेठे हे उनकि चरबि उनके शरिर का अखंड हिससा होनेसे अब तो वोह उससे जुदा होना चाहना मुशकिल बात है . देश बलवान बनानेमे चरबि वालोंका कोइ उपयोग नहि यह हमारे उपर ८०० साल मसालमानोंने ओर ३०० साल अंगरेझोंन राज किया इस बातसे साफ है . इस लिये उनकि चरबि बरकरार रखते हुए मेहनति लोग जो चरबि वालोंकि विकृत एकजुट कि वजहसेहि कंगाल रहे है, उन्हे देश कि रक्षा के लिये समर्थ बनानेके लिये उन्हे जिंदा रखना जरुरि है, यह उस उततर भारतके भडवे राजे महाराजों जैसे किसि मुसलमान अकबर फकबर को हिंदु राजपुतानि जोधा अर्पन करना सपनेमे भि नहि सोच सकने वाले दकखनके मराठा राजा शाहु छञपतिने पहले जाना ओर आरक्षण कि अवशक प्रथा भारत मे उन्होंनेही पहलि बार लागु कि. बादमे पढेलिखे ओर सहिमे काबिल लोगोंकि सहमतिसे उसे संविधान मे शमिल किया गया. मनुस्मृती को संविधानिक दर्जा देनेकी मांग करने वाले यह भी समझने के काबील रहे है कि परदेसी, मुसलमान पैगंबर के रिश्तेदार और पुरे हिन्दुओन्कि आबादी मे केवल ३,१/२ % बम्मन हि उनके बाप रहेंगे. अपनी वोह ५००० सालकि बटोरी और लुटी चरबि का हिससा किसि भडवेने त्यागने का सोचा हे कया कभी भी और अभि भि
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